Wednesday, March 15, 2023

Kitne Ghazi Aaye, Kitne Ghazi Gaye : My Life Story By Lt Gen. K.J.S. 'Tiny' Dhillon

 Introduction : 

The book titled as Kitne Ghazi Aaye, Kitne Ghazi Gaye is written by Lt Gen. K.J.S. 'Tiny' Dhillon ; a soldier par excellence of Indian army we are proud of. This book, primarily written as an autobiography, does not restrict itself to his life story only but takes you to many aspects of Indian army in fine details and his anecdotes and experiences, bitter-sweet both, during his service including his valuable suggestions to counter terrorism not only in Kashmir valley but anywhere in the world. Written in a very simple and lucid way with a flair of nationalism, this book compels the reader not to skip once started, is published by Penguin Veer, Gurugram, India. 



The General: 

After the gruesome Pulwama Attack on 14 Feb 2019, when we lost not less than 44 of brave CRPF soldiers, and when the whole country had plunged into utter sadness and anguish, and when, quite subdued, I was watching the TV for news updates about it, suddenly, there appeared a tough looking army man on the TV holding a news conference on 19 Feb 2019. His face was tense, eyes filled with the same anguish, and his raised index finger, a bit crooked, expressive of his firm resolve to eliminate the enemies of the nation – come what may! My eyes got fixed on to the TV screen to listen what he said in his stern tone warning the terrorists conveying them in no uncertain words in few crisp sentences: 

- “You pick up the gun, you are dead unless you surrender.”

- “Kitne Ghazi Aaye, Kitne Ghazi Gaye…Parwah nahin, we are there, don’t worry.”

- “…anyone who enters the Kashmir Valley will not go back alive.”

And as you know the mastermind of the attack Ghazi was killed within 72 hours after the Pulwama attack by his team. He kept his words given to his ADC Sandip Singh – “We will get the bastards.” 

Hearing him speaking straight addressing directly to the terrorists I felt a bit relaxed and got reassured that India is safe when guarded by such brave officers. He was none other than Lt. Gen. K.J.S. Tiny Dhillon. My sincere salute to him.



The Review:

Right from the beginning the book captures the mind of the reader when at the tender age of 3 years only the writer tells the incident of losing his dear mother fighting a lion, not before she assured the lion is dead strangled by her using her dupatta. Incredible! Then, he takes you to the streets of his childhood how he was nurtured by his naani and how he got selected in NDA. Then comes the chapters describing his strenuous training and the history of his iconic crooked index finger (as shown warning the terrorists on the cover page of the book) in a very interesting and funny way wherein I found the part of two successive surgical operations and the role of doctors and finally the nurse advising him to run away most hilarious. Fortunately or otherwise, he got a chance to serve in northeast quite vulnerable due to insurgency and narrates his operations in fine details like how his team got survived when lost in the mountains. Then he takes you to the most difficult and troubled part of India ; Kashmir Valley under relentless attack by the different terrorist groups. Reading that part gives the reader a thrill, fear and goosebumps and compels the reader to know more. However, the General, knowing fully well the gravity of such narrations and the serious effects of those life threatening and sheer precarious situations on the reader, keeps the reader entertaining with his various funny anecdotes making them comfortable. To serve in army is not an easy task, not even for the family members and one can imagine the gravity of the situation when the wife gets the news of death of her husband in operation just by taking the initials of someone else martyred – though feeling at peace knowing the fact and at the same time turning sad for the family who lost its brave heart in real. 

Reading of this book is a must for the boys aspiring to join army to give them first-hand information about the challenges they can face during their training, deployment, mutual cooperation and the culture of army to help each other’s family whenever required as it allays all the fears and apprehensions they may have about army. The General has a fine knack of observing the pains and difficulties of the society and convincing the mothers of would-be terrorists to give their sons a call to come back launching Operation Maa successfully. The other areas of interest are the description of various holy places like Amarnath in Kashmir Valley and his advise to control the terrorism through the policy of Saam, Daam, Dand, and Bhed. 

After going through the book, a roller coaster of army life, I fully agree to Col Manish Sanga defining Lt Gen KJS Tiny Dhillon as a brutally honest and financially frugal CO.

My sincere regards and best wishes to you sir! 

 

Dr Rajeev Pundir

16/03/2023


Thursday, March 9, 2023

चुनिंदा पन्नों से कहो : कविता संग्रह : राजवंत राज

 परिचय : 

राजवंत राज एक अद्भुत व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं । जितनी समृद्ध वो एक चित्रकार हैं मुझे लगता है उससे भी अधिक वो कलम की धनी हैं क्योंकि मैंने इसके पहले उनका एक कहानी संग्रह 'ट्रम्प कार्ड ' पढ़ा है जो बहुत ही सम सामयिक कहानियों का भण्डार है और जिसकी सभी कहानियाँ स्त्री को केंद्र में रख कर बुनी गई है । अब मुझे उनका ये कविता संग्रह पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसके गर्भ में स्त्री के भिन्न रूप विकसित होकर आपके सामने प्रस्तुत हैं । इसका प्रकाशन लखनऊ से शारदेय प्रकाशन ने किया है ।


                                                        

समीक्षा :

जहाँ तक समीक्षा करने का प्रश्न है, मैं एक समीक्षक तो स्वयं को नहीं कह सकता, हाँ एक लेखक होने के नाते ये मेरा उत्तरदायित्व है कि मैं किसी भी पुस्तक को पढ़कर उसके बारे में जो अनुभव मुझे हुए उनको अपने मित्रों और अन्य पाठकों के समक्ष रखूं ताकि अच्छी पुस्तकें लोगों तक पहुंचे और साहित्य में संवर्धन हो । राजवंत राज जी का ये कविता संग्रह स्त्री के व्यवहार, उसके चरित्र, व्यक्तित्व, भाव, प्रेम, दुःख, और सुख का लेखा जोखा है जिसको पढ़कर कभी आप बरबस मुस्कुरा पड़ते  हैं तो कभी सोच में डूब जाते हैं, कभी आपका हृदय वेदना से भर जाता है तो कभी आपकी आँखों से अनायास ही एक बूँद नमी बाहर छलक पड़ती है, कभी आप स्त्री के प्रति स्वयं को उत्तरदायी समझने लगते हैं तो कभी एक अजीब सी कुंठा या कहें तो अपराध बोध से भर जाते हैं : 

आश्चर्य की बात तो तब है कि स्त्री जब समाज से या पुरुष से ही नहीं परमात्मा से भी शिकायत करने की हिम्मत कर जाती है :

या रब ! तराशा तो, मगर इतना, कि बुत ही बना दिया ।

और जब वो कुछ कठोर होकर बोलती है : आधी बात कही थी तुमने, आधी बात मैंने भी कह दी, बात पूरी हो गई । 

और सामने वाला भी उसकी संवेदना को समझ कर उसे सांत्वना देते हुए कहता है : आओ ! तुम्हें तुमसे मिलाऊं - कि तुम्हें क्यों लगता है कि तुम गुम हो गई हो ? 

बहुत ही सुंदर वार्तालाप है  - कौन कहता है कि तुम गुम हो गई हो, सांस खींचकर अपनी छाती में, तुम्हारी सारी खुशबू उतार ली है । 

फिर से मनाने की कोशिश में वो उसकी तारीफ़ में कहता है - आओ तुम्हारी भीगीं जुल्फों में, इक चाँद तराशें, इक सूरज तराशें और चंद तारे भी तराशें । 

दोस्तों, ये रूठने मनाने का सिलसिला दो प्रेम करने वालों के मध्य सदियों पुराना है जिसे लेखिका ने बहुत सुंदर तरीके से छोटे छोटे छंदों में दर्शाया है । 

स्त्री जब प्रेम करती है तो इस हद तक करती है कि वो न जाने कब उसकी किताब में रखा मोर का पंख हो जाती है : मैंने तुम्हें किताबों की शक्ल में पढ़ा है, पढ़ते-पढ़ते न जाने कब मैं, उसने रखा मोर का पंख हो गई । 

और कितनी सुन्दरता से सहज भाव से अपनी साधारण सी सजने की इच्छा को व्यक्त करती है : जब भी दिल करता है, श्रृंगार करने का, एक सुर्ख बिंदी, माथे पे सजा लेती हूँ मैं । 

दोस्ती स्त्री के लिए कुछ इस तरह है : जब तुझे कोई दर्द हो, और मेरी आँखों में पानी उतर आये, तो समझना हमारी दोस्ती ने भरपूर ज़िंदगी जी है । 

राजवंत जी की कविताओं में एक दार्शनिक रंग भी देखने को मिला जिससे आप समझ सकते हैं कि लेखिका को आत्मिक और आध्यात्मिक अनुभव कितना गहरा है : दूसरे ही दिन एक दरवेश मिला, उसने कहा, 'तू अपनी आँखें बंद कर, उस रब को महसूस कर - वो तेरी बाहों में है, तेरे सपने में है, तेरी खुशबू में है, तेरे दिल में है, तेरी धड़कन में है, तू आँखें बंद कर, बस और बस उसे महसूस कर - फिर - मैंने आँखें बंद कीं, मुझे तुम दिखे ।





और अंत में : चुनिंदा पन्नों से कहो,

                    कि मुझे आकर मिलें 

                    मेरे शब्दों को समेट लें

                    ये बहुत -बहुत नाज़ुक हैं

                    मैं इन्हें हर किसी के सुपुर्द नहीं कर सकती 

मुख पृष्ठ :

पुस्तक का कवर अति सुंदर है और राजवंत जी की चित्रकारी का उत्कृष्ट नमूना है जिसमें आप साधारण स्त्रियों के सौन्दर्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं 


मित्रों पूरी पुस्तक बहुत ही मार्मिक, प्रेम, संवेदना, कभी आपको प्रसन्न तो कभी गहरे दर्द का अहसास और गंभीर  सोच में डुबोने वाली कविताओं से समृद्ध है और मैं इसके लिए राजवंत जी को बहुत बहुत बधाई और उनकी लेखनी को नमन करता हूँ । उनके आने वाले साहित्य का मुझे इंतज़ार रहेगा और मेरी हार्दिक शुभकामनाएं । सभी से आग्रह है कि इस किताब को अपने संग्रह का अंग अवश्य बनाएं, स्वयं पढ़ें और अपने मित्रों को भी पढ़ने को कहें ।

डॉ राजीव पुंडीर 

10 March 2023



Wednesday, October 19, 2022

फूस और जुगनू : कविता संग्रह लेखक गौरव शर्मा

 "हर्षित होता हूँ तो कहानी कहता हूँ, व्यथित होता हूँ तो गीत " अपने लेखन के विषय में ऐसा कहने वाले लेखक गौरव शर्मा जो एक शुष्क और कठिन समझे जाने वाले विषय गणित के प्राध्यापक हैं - मेरी दृष्टि में एक सहृदय, भावुक और फूल की तरह कोमल मन वाले व्यक्ति हैं जो बड़ी सहजता से जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों को कभी अपनी कहानियों में तो कभी अपनी पानी की तरह कल-कल करती कविताओं में कहने की अद्भुत क्षमता रखते हैं । फूस और जुगनू उनका दूसरा कविता संग्रह है जिसे The Little Booktique Hub, Kolkata ने प्रकाशित किया है ।


गौरव शर्मा की कवितायें, जैसे कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, मन की उन अवस्थाओं और आनेजाने वाले भावों को प्रदर्शित करती हैं जब व्यक्ति अपने जीवन से संघर्ष करते करते कुछ निराश, कुछ हताश और कुछ दुःख से ग्रसित होता तो अवश्य है लेकिन उस कठिन समय में वो खुद को सांत्वना देता है, खुद का साहस बढ़ाता है, खुद की पीठ कभी एक माँ बनकर, तो कभी एक पिता बनकर थपथपाता है, कभी बिलकुल एक छोटे बच्चे की मानिंद कुछ भी पाने की ज़िद करता है, कभी खुद से ही रूठ जाता है तो कभी खुद से ही मान जाने की ठिठोली भी करता है । 

इस किताब से कुछ पद यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा :

1. लौ घट रही है दिए की, इसे तकते रहना, 

    मैं जगा हूँ जब तक, तुम भी जगते रहना ।

2. सपने जेब में लेकर एक मतवाला निकला है अकेला, 

    कहानियाँ संभल गईं ये किरदार कौन है ।

3. रोज़ वो सपना, चाँद खरीदने की, इच्छा से शुरू होता था,

    और कुछ क्षणों बाद ही, पैसे पूरे ना होने मायूसी पर, ख़त्म हो जाता था ।

4. ज़िंदगी में धूप ही धूप है, छाँव है ही नहीं,

   अब चुपके से रो लेता हूँ, माँ है ही नहीं ।


5. दिन छुपे माथे पे हाथ फिराता हूँ, तो नमक उतरता है,
    
    शायद काफ़ी कमा लेता हूँ, फिर क्यों जिम्मेदारियों का मुँह बन जाता है ?



मित्रों, गौरव शर्मा की कवितायें प्रतिदिन जिम्मेदारियों का बोझ उठाते, परिस्थितियों से जूझते, उन सभी व्यक्तियों के लिए हैं जो कभी न कभी जीवन की रेलमपेल में निराश हो जाते हैं - तब उन्हें चाहिए होता है ऐसा कुछ जो उन्हें उस अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाए जहाँ शांति है, सुकून है, आशा है और अंत में जीत भी - और वो सब कुछ मिल सकता है ऐसी सुंदर मन भावन कविताओं से जो आपके कानों में फुसफुसा कर कहती हैं - कोई बात नहीं ये तो सबके साथ होता है, होता रहता है, बस तुम दिल छोटा न करो, आगे चलो, चलते जाओ, मंजिल बस सामने ही तो खड़ी है ।

मैं गौरव शर्मा को इस कविता संग्रह के लिए बहुत बहुत शुभ कामनाएं देता हूँ...और कामना करता हूँ वो ऐसे ही लिखते रहें...अनवरत !

राजीव पुंडीर 
19 OCT 2022

Thursday, September 1, 2022

एक मुलाक़ात जवाहर लाल नेहरू के साथ - समीक्षा द्वारा शिखर चंद जैन

  पुस्तक समीक्षा


जवाहरलाल नेहरू पर चौंकाने वाली पुस्तक



पुस्तक – एक मुलाकात: जवाहरलाल नेहरू के साथ 

लेखक - राजीव पुंडीर

प्रकाशक - राजमंगल प्रकाशन,अलीगढ़

मूल्य - 249/

प्रकाशक संपर्क -- 7017993445

पृष्ठ - 174


देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु या राष्ट्रपिता की पदवी से नवाजे गए मोहनदास करमचंद गांधी सहित हमारे महानायकों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कुछ ऐसे चापलूसों या समर्थकों द्वारा, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व के कमज़ोर पक्ष को नजरअंदाज कर दिया तो कुछ निष्पक्ष और तटस्थ लोगों द्वारा जिन्होंने सिक्के के दोनों पहलुओं पर प्रकाश डाला। खुद इन महानायकों ने भी अपनी किसी पुस्तक में अपने व्यक्तित्व के स्याह सफेद पहलुओं पर जाने या अनजाने में बहुत कुछ लिखा है। 


अगर आप एक ईमानदार पाठक, विद्यार्थी या जिज्ञासु व्यक्ति हैं तो कभी भी किसी महापुरुष के व्यक्तित्व या सोच की एकतरफा जानकारी से संतुष्ट नहीं हो सकते।


प्रस्तुत पुस्तक बेहद रोचक अंदाज में नेहरू के व्यक्तिव, कृतित्व, सोच और उनकी राजनीतिक - सामाजिक शुचिता से जुड़ी उन बातों से रूबरू कराती है जिन पर आम तौर पर न खुल कर कुछ कहा गया, न छापा या कभी पढ़ाया गया।



क्या आपने कहीं पढ़ा कि जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रवाद को एक रोग कहा था? क्या आपने कहीं पढ़ा कि नेहरू भव्य मंदिरों के निर्माण और उनके दर्शन से कुछ चिढ़ से जाते थे या उन्हें वे अच्छे नहीं लगते थे? क्या आप जानते हैं कि नेहरू धर्म को एक अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे? आप शायद नहीं जानते कि नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में खुद लिखा है कि वे किसी भगवान, धर्म या पंथ में विश्वास नहीं करते, उनकी आस्था मार्क्स और लेनिन में है।


इस पुस्तक में ऐसी बहुत सी बातें उजागर की गई हैं जिन्हें लेखक ने कल्पना में खुद को एक विद्यार्थी मानते हुए नेहरु जी से सवाल करते हुए उनके द्वारा दिए जवाबों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।


कथित निष्पक्ष इतिहासकारों द्वारा नेहरू की मौजूदा गढ़ी गई या "बनाई गई" छवि से इतर उन्हें जानना चाहें तो यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी, रोचक और संग्रहणीय है। लेखक ने किसी पूर्वाग्रह के वशीभूत, हवा हवाई या अपने मन से पुस्तक में कुछ भी नहीं कहा है बल्कि अपनी बातों को विख्यात और सर्वस्वीकृत पुस्तकों में प्रकाशित कथ्यों व तथ्यों के माध्यम से ही स्थापित और प्रमाणित किया है।


जिन पुस्तकों से कथ्य और तथ्य लिए हैं वे संदर्भ ग्रंथ हैं – द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एन ऑटोबायोग्राफी - जवाहरलाल नेहरू  एवम पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन।


शिखर चंद जैन


SHIKHAR CHAND JAIN

67/49 STRAND ROAD

3RD FLOOR

KOLKATA 700007(WB)




Thursday, August 25, 2022

हाशिये पर जाती ज़िंदगी... : समीक्षा उपन्यास - लेखिका रंजना प्रकाश

 प्रस्तावना : प्रतिष्ठित लेखिका रंजना प्रकाश का नया उपन्यास "हाशिये पर जाती ज़िंदगी..." आपके सामने प्रस्तुत है जिसका प्रकाशन Evincepub Publishing बिलासपुर छत्तीसगढ़ ने किया है। ये उपन्यास अमेज़न पर उपलब्ध है । प्रथम दृष्टया उपन्यास रंजना जी की कलम से निकली चिर परिचित लेखन शैली से सराबोर है और हमेशा की तरह विभिन्न भावों के रंगों से ओत प्रोत है । 


समीक्षा : मुख्यतः ये उपन्यास सुगंधा नाम की एक अधेड़ स्त्री की कहानी है जिसके पति को गुज़रे कई साल बीत चुके हैं । दो बच्चे हैं एक लड़का एक लड़की और दोनों ही शादी के बाद अपने अपने काम में व्यस्त हैं । इसी कारण उसको अकेला रहना पड़ता है । धीरे धीरे ये अकेलापन उसको खलने लगता है और उसे लगता है कि उसकी ज़िंदगी अब हाशिये की ओर खिसकने लगी है । जब किसी को ज़िंदगी अर्थहीन और इस कदर सिमटी हुई लगे तो कोई भी व्यक्ति इसे अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सकता और धीरे धीरे मानसिक रूप से कमज़ोर और अंत में अवसाद से ग्रस्त हो जाता है । सुगंधा भी किसी हद तक इस स्थिति का शिकार हो चली थी कि अचानक किसी बहाने से अपनी दोस्त और पड़ोसन रमोला, जो स्वयं लगभग उसी स्थिति से गुज़र रही है क्यूंकि शादी के बहुत दिनों बाद भी उसकी गोद सूनी है, उसके घर जाती है और परिस्थिति कुछ ऐसी बन जाती है कि दोनों स्त्रियाँ एक दूसरे का संबल बन जाती हैं, एक दूसरे को अवसाद से बाहर निकालती हैं, एक दूसरे का साहस बढ़ाती हैं और रमोला के गुरूजी जो बाद में सुगंधा के भी गुरु बन कर उसके भीतर छिपे गुण और कला को पहचान कर उसके अंदर एक उत्साह भर देते हैं और एक पिता की तरह उसकी उंगली पकड़ उसको ज़िंदगी के हाशिये से उठाकर मुखपृष्ठ की ओर ले जाते हैं - फलस्वरूप सुगंधा की ज़िंदगी सुगंध से भर जाती है और वो अपना वर्षों पुराना सपना पूरा कर लेती है । ये सब कुछ किस प्रकार से होता है ये जानने के लिए पढ़िए उपन्यास - हाशिये पे जाती ज़िंदगी ।



हमेशा की तरह रंजना प्रकाश का ये उपन्यास भी भावों का सागर नहीं महासागर है जिसकी गिरती उठती लहरें पाठक को सराबोर कर देती हैं । रंजना जी की उत्तम भाषा शैली जिसमें प्रकृति के सभी रंग, सभी छटाएं, कहीं पीली मखमली धूप, कहीं कुहू कुहू करती कोयल, हरे भरे पेड़, उगते  और छिपते सूरज की सुन्दरता, विशाल पहाड़ और उनकी चोटियों पर बर्फ़ का धवल मुकुट, गुनगुनाती हुई हवा और न जाने किन किन अलंकारों से ये उपन्यास सजा हुआ है कि पाठक मंत्रमुग्ध होकर एक के बाद एक पृष्ठ पलटने पर स्वयं को बाध्य कर देता है । 



पुस्तक का मुखपृष्ठ और बढ़िया और कलात्मक हो सकता था जिसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता है । बाक़ी पुस्तक की टाइपिंग प्रिंटिंग सब बहुत बढ़िया है और कोई शाब्दिक या व्याकरण की त्रुटी भी नहीं है ।

इस पुस्तक के लिए मैं रंजना प्रकाश को हृदय से बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि हमें भविष्य में भी उनकी कलम से इसी प्रकार के उत्तम हिंदी साहित्य पढ़ने को मिलते रहेंगे ।


राजीव पुंडीर 

25 / 08 / 2022

Wednesday, May 25, 2022

वहीदा : कहानी संग्रह - लेखक गौरव शर्मा

 गौरव शर्मा, गणित के आचार्य और एक जाने माने लेखक हैं । मैं इनके द्वारा लिखित सभी  उपन्यास ;  Love at Airforce, Rape Scars, Dawn at Dusk and It all Happened in a School, पढ़ चुका हूँ जिनमें Love at Airforce ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया । मैं फेसबुक के माध्यम से उनसे जुड़ा हुआ हूँ और सतत रूप से उनके द्वारा लिखी छोटी बड़ी कवितायें, मुक्तक और शायरी पढ़ता रहता हूँ लेकिन एक कविता संग्रह के रूप में 'वहीदा' शीर्षक से पहली किताब आई है जिसे Petals Publishers लुधियाना ने प्रकाशित किया है और Amazon.in पर उपलब्ध है ।


किताब के शीर्षक और मुख पृष्ठ पर छपे फिल्म अदाकारा वहीदा रहमान के चित्र से आपको अनुमान हो जाता है कि सभी कवितायें वहीदा के ऊपर ही लिखी गईं हैं और उन्हीं को समर्पित हैं । हिंदी साहित्य में सामान्य रूप से किसी एक व्यक्ति के ऊपर इतनी कवितायें किसी ने लिखी हों मुझे इसका ज्ञान नहीं है इसलिए ये किताब, एक असाधारण काव्य रचना का उदाहरण है और एक नया प्रयोग भी ।



हम सब इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि वहीदा रहमान हिंदी सिनेमा की एक उत्कृष्ट अदाकारा रही हैं लेकिन कोई व्यक्ति उनकी अदाकारी, उनके व्यक्तित्व, उनकी ख़ूबसूरती, उनकी सादगी, से इतना प्रभावित हो जाएगा कि उनके ऊपर ढेर सारी कवितायें लिख देगा ये अपने आप में एक अनोखा कार्य है जो बिना उस विषय का गहन अध्ययन किये, बिना गहराई में उतरे नहीं हो सकता । मुझे ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि गौरव शर्मा ने पूर्ण तन्मयता से इस कार्य को निष्पादित किया है । इसके लिए मैं उन्हें बहुत बहुत बधाई देता हूँ ।

 इन कविताओं का जन्म वहीदा रहमान के द्वारा निभाए गए भिन्न भिन्न चरित्रों की मिट्टी से होता है जो फिल्म काला बाज़ार से शुरू होकर चौदवीं का चाँद  तक आते आते एक अमलतास के वृक्ष की भाँति पीले खूबसूरत फूलों से सराबोर बड़ा हो जाता है जिसे देखकर या कहें कि पढ़कर आप आनंदित हुए बिना नहीं रह सकते । लेखक की कल्पना बहुत सुंदर है जैसे :

 मधुशाला की दीवार की इंटों के बीच से, तुलसी का एक पौधा उग आया हो जैसे, 

या फिर, सूने आसमान पर चिट्टे बादलों के फूल बिखर गए हों जैसे, 

या मैं तुम्हें मीता पुकारूंगी, कौन होता जो उस आवाज़ से ये सुनकर बह न जाता, लोहा भी होता तो पिघल कर चरणामृत हो जाता,

देखा ना होगा कभी किसी ने, रूह की आँख से बहता पानी,

आंसू से गुंथी मिट्टी का बोझ लिए, चाक अनमना चल रहा हो, सांझ की नीली ओस पीकर मन में दिया बस जल रहा हो 

ओ बूँद, क्या सोचती थी तुम, जब बादलों से चली थी ? मन में सपनों की गुदगुदी थी, या चिंताओं की खलबली थी ?

और पूरी किताब ऐसे अहसासों से सराबोर है जिनमें वहीदा के चरित्रों के दुःख हैं, प्रसन्नता है, मजबूरी है, अल्हड़ता है, प्रेम है और वो सब कुछ है जो उन पात्रों ने वहीदा के माध्यम से जिया है । अगर देखा जाये तो वहीदा जी को अपने सम्पूर्ण फ़िल्मी जीवन में न जाने कितने पुरस्कार मिले होंगे लेकिन उनके बारे में इतनी सुंदर दिल को छूने वाली कवितायें शायद किसी न लिखी हों और किसी कलाकार के लिए इससे बड़ा पुरस्कार शायद नहीं हो सकता । 

लेकिन, वहीदा रहमान के व्यक्तित्व और अदाकारी ने लेखक गौरव शर्मा, जो मेरे मित्र भी हैं, को इस हद तक प्रभावित किया कि उनके द्वारा निभाए गए चरित्रों को जिन लेखकों ने लिखा उनका भी आभार करना चाहिए था, जो छूट गया और मैं समझता हूँ कि ये एक स्वाभाविक भूल है । मेरा विनम्र निवेदन है कि अगले संस्करण में उन लेखकों का नाम भी जोड़ा जाए और उनके प्रति आभार भी क्योंकि एक लेखक ही दूसरे लेखक के योगदान को समझ सकता है, उसे उसका यथोचित सम्मान दे सकता है।


अंत में बस कहना चाहूँगा कि किताब बहुत बढ़िया कविताओं से भरी हुई है । ये किताब और कवितायें उन युवा लेखकों के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है जो लिखना चाहते हैं लेकिन लेखन में कितना श्रम करना चाहिये उससे अभी अनभिग्य हैं । मैं गौरव शर्मा के लिए ह्रदय से शुभकामनाएं देता हूँ और आशा करता हूँ कि वो ऐसे ही लिखते रहें और हम उनकी किताबों से अपने मनोरंजन के साथ साथ कुछ न कुछ सीखते भी रहें ।


राजीव पुंडीर 

25 May 2022

  

Monday, March 7, 2022

समीक्षा : ट्रम्प कार्ड : कहानी संग्रह - लेखिका राजवंत राज

 एक परिचय :

राजवंत राज जी से मेरा बहुत पुराना, लगभग चार - पांच साल पुराना नाता है। वैसे हम फेसबुक वाले मित्र हैं और शायद हम दोनों ही एक दूसरे के बारे में बस इतना ही जानते हैं कि राजवंत जी एक बढ़िया चित्रकार हैं और मैं एक लेखक। हाल ही में उनके कहानी संग्रह "ट्रम्प कार्ड" के बारे में फेसबुक के माध्यम से पता चला तो मन में एक उत्सुकता, एक जिज्ञासा हुई कि जो व्यक्ति इतनी सुंदर चित्रकारी करता है, वो लिखता भी बहुत सुंदर होगा। और जैसे ही मैंने इस किताब को पढ़ने की इच्छा व्यक्त की, तुरंत उनकी तरफ़ से आश्वासन मिल गया कि वो स्वयं मुझे इस किताब को भेज देंगी। और तीन चार दिन में ये पुस्तक "ट्रम्प कार्ड" मेरे आगोश में आ गई। इस किताब का प्रकाशन  सृजन लोक प्रकाशन, नई दिल्ली ने किया है। किताब में कुल ग्यारह कहानियां हैं जो 95 पृष्ठों में समाई हुई हैं। 

समीक्षा :

पुस्तक का मुख पृष्ठ लेखिका के द्वारा बनाये गए चित्र से ही आपको आकर्षित करने लगता है। चित्र एक स्त्री का है जिससे ये अनुमान तो हो ही जाता है कि इस पुस्तक की कहानियाँ स्त्री चरित्र - प्रधान हैं। कहानी संग्रह की सभी कहानियों की नायिकाएं, चाहे वो एक विधवा है, चाहे एक विवाहिता है, या फिर एक परितक्यता  है, एक प्रेमिका है, पति के शुक्राणु विहीन होने के कारण  संतान-विहीन है, या फिर हॉस्टल की एक वार्डन, चाहे एक लेखिका, या फिर एक अल्हड़ छोटी बहन, चाहे एक सिख युवक से प्रेम करने वाली एक मुस्लिम लड़की, सभी मानसिक रूप से शक्तिशाली हैं जो समाज में व्यापित स्त्रियों के प्रति अन्याय, दुराचार और भेदभाव का शिकार होने से इंकार कर विद्रोह करती दिखाई देती हैं। वो स्त्रियाँ भले ही अनपढ़ और गरीब हों, या फिर उच्च शिक्षा प्राप्त आज की नारी हो, सभी समाज की परवाह न करते हुए अपने अधिकार, स्वयं के व्यक्तित्व को एक स्वतंत्र और अपने खोये हुए आत्म सम्मान को समाज में पुनर्स्थापित करने के लिए संघर्ष करती हैं और उस कठिन संघर्ष में सफल भी होती हैं। ये कहानी संग्रह सभी आयु की महिलाओं, विशेषरूप से लड़कियों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करने में, उन्हें यथोचित मानसिक बल और सही दिशा प्रदान करने में पूर्णतया समर्थ है - इसलिए इसका पढ़ना उनके लिए अति आवश्यक है।


अगर इस कहानी संग्रह को हम साहित्य की दृष्टि से देखें तो मुझे लगता है कि साहित्य के सभी मानदंडों पर ये सोने की तरह खरा, सूर्य की तरह प्रकाशवान, चंद्रमा की शीतल चांदनी से ओतप्रोत, वायु के नरम गरम झोंकों की तरह सुहानी थपकियाँ देता, और कभी अग्नि के ताप जैसा तो कभी वर्षा की ठंडी बौछारों जैसा अनुभव कराने में अपने में विशेषज्ञता समेटे हुए है। कहानियों की भाषा शैली स्वच्छ जल की तरह कलकल बहते झरने की सी है जो पाठक को एक सुखद अनुभव का अहसास कराती हुई उसे और आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है और निरंतर उत्सुकता बनाए रखने में सफल हैं। उदाहरण के लिए : 

"उस तूफानी रात में अमरीक सिंह के डर और बेइंतहा दर्द को बर्दास्त करने की गरज से उसी दो हरे नोटों से दारु की बोतल आई और ब्याहता बेटी की इज्ज़त और मौत दोनों को घूँट - घूँट गले से नीचे उतार...बेटी के अस्तित्व को ही बीते माह के कलेंडर के पन्ने की तरह फाड़ कर फेंक दिया।" ( सिगेरां वाली,  पेज नं 26)

"सच ! मर्द औरत के लिए ज़मीन और आसमाँ सब बन सकता है बशर्ते उसने औरत का दिल पढ़ लिया हो...लेकिन जहाँ ग़लतफहमी और बेएतबारी का कीड़ा लग जाता है वहां आसमान धुंधला और धरती बंजर हो जाती है।" (जूड़े वाला क्लिप,  पेज नं 35)

"क्लिष्ट शब्दों में छिपे गूढ़ अर्थों से परे वो एक ऐसी कविता लगती जिसमें कहीं कोई उतार - चढ़ाव नज़र नहीं आता । बस एक सीधी खिंची लकीर सी।" (नताशा पेज नं 38)

"मतलब बिलकुल साफ़ है आशु ! अगर तुमने मुझे कहीं ये कह दिया होता कि मैं तुम्हारे पूरे नौ महीने का माँ बनने का सफ़र देखना चाहता हूँ...तुम्हारे गर्भ में कान लगाकर उसके दिल की धड़कन सुनना चाहता हूँ...वो सारी फीलिंग महसूस करना चाहता हूँ जो एक पिता महसूसता है तो विश्वास मानो...हो सकता था कि मैं अपनी सोच से परे होकर तुम्हारी बात मान लेती..." (ट्रम्प कार्ड पेज नं 49.)

लेखिका ने पात्रों के उद्गारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए यथायोग्य अलंकारों का प्रयोग अपने लेखन में किया है जिसने इस कहानी संग्रह को और भी सुंदर तथा रोचक बना दिया है। वैसे राजवंत जी के लेखन में कोई कमी नहीं है लेकिन कहानी संग्रह की समीक्षा पुस्तक के आरम्भ में नहीं अंत में होती तो अच्छा होता क्योंकि समीक्षा पढ़ने के बाद कहानियाँ पढ़ने की उत्सुकता कम हो सकती है। 

राजवंत जी को इसके लिए साधुवाद और भविष्य के लिए बहुत बहुत शुभ कामनाएं देता हूँ। आशा है कि वो ऐसे ही सुंदर कहानियों का सृजन करती रहें और हम ऐसे ही उनकी लिखी कहानियों का आनन्द उठाते रहें।

राजीव पुंडीर 

7 मार्च 2022


Wednesday, August 11, 2021

पुस्तक समीक्षा : विविधा : लेखिका श्रीमती रंजना प्रकाश

 रंजना प्रकाश एक प्रसिद्ध लेखिका हैं और इनकी कई किताबें मैं पढ़ चुका हूँ जिनमें अनावरण, सिन्दूर खेला, प्रारब्ध और प्रेम उपन्यास और एक प्याला कॉफ़ी कविता संग्रह प्रमुख हैं । इनकी सभी किताबें अपने आप में सुंदर लेखन शैली, धाराप्रवाह भाषा, कथानक की विविधता और गहराई से सराबोर होती हैं । इसी कड़ी में हाल ही में एक नई पुस्तक आई है जिसका शीर्षक ही "विविधा - एक सोपान" है जिसे एवींसपब पब्लिशिंग ने प्रकाशित किया है।

आइये इस पुस्तक के बारे में चर्चा करते है :

जब मैंने इस पुस्तक को पढ़ना शुरू किया तो मुझे लेशमात्र भी अंदाज़ा नहीं था कि आखिर लेखिका ने इस पुस्तक का नाम विविधा क्यूँ रखा लेकिन धीरे -धीरे जब आगे चला तो एक आश्चर्य का सामना हुआ। शुरू में इस किताब में छोटी-छोटी कहानियां हैं जो लघु तो हैं मगर उनकी शैली ऐसी है कि पाठक के मन पर एक गहरी छाप छोड़ने में सफल हो गई हैं क्योंकि सभी कहानियां जीवन के हर पहलू से बड़ी ही सहजता से उठा कर बहुत ही नफासत के साथ पाठक के सामने परोस दी गई हैं - एक उत्तम स्वादिष्ट भोजन की भाँती जिसमें मीठा, खट्टा और चरपरा एक संतुलित और उचित मात्रा में वो सब कुछ है जो एक अतिथि को विशिष्ट समझ कर बनाया जाता है। वैसे सभी कहानियां सुंदर और असरदार हैं लेकिन इमोशनल फूल, फ़ोकट का डॉक्टर और नियम भंग ने मुझे काफी प्रभावित किया।


आधी किताब चुक जाने के बाद जो विषय लेखिका ने उठाए हैं उन पर लिखना एक दुरूह कार्य है जो एक परिपक्व और गहन समझ रखने वाला लेखक ही कर सकता है। नारी का मानसिक बल और चरित्र हो या फिर कोरोना से होने वाले मानसिक तनाव के कारण बनते - बिगड़ते आपसी सम्बन्ध और कुछ लोगों के द्वारा की गई आत्म हत्या से लेकर पर्यावरण का महत्त्व हो या फिर आयुर्वेद की समाज में उपयोगिता, राम से लेकर कृष्ण और शिव को समझना हो या फिर सुख दुःख की परिभाषा, प्रेम, भक्ति, क्रोध, करुणा, सफलता असफलता जैसे भाव और सबसे बढ़कर ॐ शब्द की व्याख्या और उसका हमारे जीवन में महत्त्व - सब कुछ इतना विविधता से लबालब है कि आपको आश्चर्य होने लगता है कि आखिर लेखिका के ज्ञान की क्या कोई सीमा नहीं और अचानक ही आप उनके सामने नतमस्तक हो जाते हैं । ये सब कोई कुछ दिनों का अनुभव नहीं वरन जीवन भर की तपस्या के बाद ही लिखा जा सकता है और इसके लिए मैं लेखिका रंजना प्रकाश हृदय से नमन करता हूँ और बधाई देता हूँ क्योंकि हिंदी साहित्य में शायद ही किसी ने इस तरह का अद्भुत प्रयोग किया हो जो सभी लेखकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।


इस किताब में कुछ शाब्दिक त्रुटियाँ हैं जो शायद टाइप करते हुए आ गई हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। दूसरे किताब का मुखपृष्ठ एकदम भावशून्य है जिसको बदलने की ज़रुरत है। किसी भी किताब का कवर बोलने वाला होना चाहिए जो पाठक को उत्सुकता से भर दे और अंदर की छवि को बाहर प्रकाशित कर दे।

मैं आने वाले समय में रंजना जी की कलम से इसी प्रकार के विविधता से परिपूर्ण साहित्य की रचना की अपेक्षा करता हूँ।

राजीव पुंडीर 

11/08/2021

Wednesday, January 13, 2021

तोष : कविता संग्रह : लेखिका गरिमा मिश्रा

 लेखिका गरिमा मिश्रा से परिचय तब हुआ था जब वो मेरे द्वारा संपादित कहानी संग्रह "ज़िंदगी : कभी धूप कभी छांव" की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में जुड़ी। उसमें उनकी एक कहानी और कुछ कवितायें थीं जिनको पढ़कर हर कोई प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। लेकिन उनका ये कविता संग्रह जो अभी "तोष" के नाम से आया है पढ़ने वालों को उनकी कविताओं से नहीं उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और कविता लेखन में उनकी पकड़ से रु-ब-रु कराने में सौ प्रतिशत कामयाब हो गया है। 

तोष की कवितायें गंभीर और सार गर्भित हैं। यदि आप उनसे तत्परता से गुजरना चाहेंगे तो आप न उन्हें पूर्ण रुपेण ग्रहण कर पाएंगे  और न ही पढ़ने का आनंद ले पाएंगे। इसलिए धीरता के साथ तन्मय होकर पढ़ें। तोष की कवितायें गंभीर होते भी एक शांत धीमी धीमी शीतल हवा के झोंके की तरह आपके मन को छूती हैं, कभी गुदगुदाती हैं, कभी आपको भाव विभोर कर आपकी आँखें नम कर देती हैं, कभी लगता है की आप तपते सूरज के नीचे खड़े झुलस रहे हैं और कभी आपको एहसास होता है कि आपके ऊपर ठंडी चाँदनी बादलों के बीच से छन छन कर बरस रही है : 

1 मनाई है कितनी ही ईद राहे महताब, ये और बात है कि मेरे ही सहन नहीं उतरा कभी वो...

2 एक रिश्ता है साँसों में बसी खुशबू सा, रगों में ढली बोली सा, कुछ खट्टा कुछ मीठा सा, एक रिश्ता है गरम नरम हथेली सा, कच्ची पक्की हवेली सा, एक रिश्ता है संग यादें हैं, वो है दूर किसी पहेली सा....

एक अद्भुत शेर है:

एक रूहानी सी मासूमियत उतार आती है, हर कत्ल के पहले क़ातिल पे,

कत्ल ए तहज़ीब निभाई इस तरह...

दूसरा है :

अक्सर जिस्मों के दायरे से, निकलकर सुख़न तेरे पैरहन मिली, तू भी क्या चीज़ है ज़िंदगी, जब मिली उलझन में मिली।

लेखिका का खुद का दर्द अनेकों शेरों में झलकता है। लगता है किसी ने उन्हें बेपनाह दर्द भी दिया है क्योंकि इतनी भावुक और दर्द भरी शायरी शायद वो ही लिख सकता है जो उस दर्द के समंदर से खुद डूब कर गुज़रा हो. हालांकि ये नयी बात भी नहीं है क्योंकि सभी लेखकों के साथ कमोबेश ये होता है कि लिखते समय उनके दर्द उनके अल्फ़ाज़ों में ढल जाते हैं। 

  एक बानगी : 

मेरा वजूद, मेरा वक़्त सब उसका, मैं अपने ही हिस्से की न रही। वो गैरों से यूं मिलवाता है मुझको, जैसे कोई बीता हुआ लम्हा कोई। मैं उसकी यादों में बीतती, अपने ही लिखे किस्से की न रही...


दोस्तों बहुत ही उम्दा कवितायें हैं, प्रेम, विरह, यादें और न जाने कितने भावों से परिपूर्ण ये कविताएं निश्चित रूप से संग्रह के योग्य हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि हिन्दी-उर्दू साहित्य को समृद्ध करने की शक्ति रखतीं हैं। 

अपने नाम के अनुसार ये किताब "तोष" पाठकों को संतुष्टि से लबालब  भर देगी। साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अद्भुत काव्य संग्रह है। अमेज़न पर उपलब्ध है जिसे एविन्स पब्लिशर ने छापा है। 

मैं, एक लेखिका, विशेष रूप से एक कवियित्री के रूप में गरिमा मिश्रा के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए अपनी शुभकामनायें प्रेषित करता हूँ। 


राजीव पुंडीर

13 जनवरी 2021

Saturday, December 5, 2020

Review : It All Happened In A School : Novel by Gaurav Sharma

 Gaurav Sharma is an accomplished writer and I still admire and remember many anecdotes from his first book Love @ Airforce. Later Rape Scars & Dawn at Dusk came and hailed by readers. His latest is "It All Happened In A School" published by Petal Publishers. 

The Story:

The pivot of the story is a School named God & Guru Convent School run by a joint management committee of two religious organisations pertaining to Sikh and Christian communities. Half of the book keeps you entertaining by the usual conversation among the staff members the undercurrent of which is mostly sex oriented happening in any given office. Perhaps the writer wants to keep the reader in a lighter vein creating a jovial atmosphere before he takes you to the next half where something grave happens. However in between he introduces the style of functioning of a private school like their highhandedness, monopoly and an exploitation of the staff, mainly teachers by the management through fringe events.To know what grave happens in the later half - read the book. 



Review:

The book has been written in non-sequential manner as the subplots come to light one by one nowhere related one another. The interview for selecting a teacher, a classroom prank, a murder and in the last a rape all happen independently keeping the reader guessing all the time. The main protagonist of the story is an honest teacher Saubhagya but most of the chapters have been titled after another fellow teacher Harjeet Singh which I found a bit surprising. The cover page of the book is so-so and could have been designed in more expressive manner synchronising with the story. However the writer has successfully portrayed all the incidents which happened or may happen in any given school so that the parents become attentive and aware about the safety of their wards.

The real take away from this book are few compelling quotes - strong enough to stir the readers' conscience:

"I want to breathe life. I've had enough of the desert. I want my share of oasis now."

"Women are always sure about two things : When do they look more beautiful and what does the man staring at her wants."

"Mathematics is a flattery loving muse. She expects that you spend lots of time with her, she will make you a king. If you ignore her, she will make you miserable."

"Truth is a blade. You shouldn't keep it between your lips."

"We teachers change the world everyday. Teachers are the heart and students are the blood of a school."

An error is to be corrected when the head of the police team asks to show him the spot where the raped girl was found but with a wrong name. 

My Take:

This book is an eyeopener for the parents and perhaps has been written to make them aware about the safety of their children as similar incidents have been and are being reported more often than not. I wish all the best to Gaurav Sharma for the success of the book. 


Rajeev Pundir

06/12/2020 

Monday, November 23, 2020

एक प्याला कॉफी : कविता संग्रह : लेखिका : रंजना प्रकाश

इश्क़ में अल्फ़ाज़ों की 

ज़रूरत क्या है,

बात बनती ही तब है 

जब कही ना जाये ........

ये पंक्तियाँ रंजना जी के नए कविता संग्रह से उद्दृत कर रहा हूँ...जो नितांत सत्य है और  स्त्री और पुरुष के आदि काल से चले आ रहे संबंध के बीच ये मौन गंगा की तरह पावन ही सतत बह रहा है। कहते भी हैं कि सत्य का स्वरूप सिर्फ मौन में ही समझा जा सकता है - क्योंकि जैसे ही हम सत्य को शब्दों का परिवेश देने लगते हैं वैसे ही असत्य अपने पैर पसारने लगता है। 

इश्क़ में यादों की

 मंज़िल तो बता दो यारों,

खबर तो हो के सफर 

और कितना बाकी है...

मित्रों आपको भी पता है कि इश्क़ एक मदहोशी का नाम है। जो इसमें पड़ जाता है उसे दीन दुनिया का कोई ध्यान नहीं रहता। परंतु लोग कह नहीं पाते कि आखिर ये मदहोशी इश्क़ के कारण ही है या कोई और नशा है...लेकिन एक सिद्दहस्त लेखिका ने कितनी आसानी से कितनी गहरी बात को उजागर कर दिया है... 




प्यार में रूबरू न हुए,

तो कोई बात नहीं, 

सिर्फ अहसास ही काफी है,

सांस लेने के लिए...

मुझे इन पंक्तियों में एक प्रेमी दिखा, एक प्रेमिका दिखी और एक तरफा प्रेम दिखा जिसको एक दार्शनिक की पोशाक पहनाकर रंजना जी ने आपके कानों में  सहजता से गुनगुना दिया...बहुत ही उम्दा और खूबसूरती के साथ। 


शाख से गिरते सूखे,

पत्तों से बचकर चलना, 

पाँव न रखना लोगों,

यहीं कहीं इस टूटे दिल के 

कतरे गिरे थे कभी...

इन पंक्तियों में अद्भुत दर्द का एहसास है। वो दर्द जो अपने किसी विशेष का दिया होता है। जब कोई इस प्रकार से दिल तोड़ता है कि चूर चूर होकर बिखर जाता है...

पूरी किताब जिसका शीर्षक भी बहुत अनोखा है "एक प्याला कॉफी" इसी तरह की अनुभूतियों, उद्गारों, अहसासों, और भावनाओं से सराबोर है जो आपको भी अपनी धीमी धीमी फुहारों से पाठक को भिगोने लगती है। पाठक कभी दर्द से भर जाता है और गमगीन हो जाता है, कभी पढ़ते पढ़ते उसके होठों पर एक मखमली मुस्कान तैर जाती है, कभी उसका अस्तित्व गंभीरता से भर उठता है तो कभी आँख बंद कर वो अपने प्रेमी के साथ बिताए खुशनुमा क्षणों को याद करके उनमें डूब जाता है...क्योंकि ये पुस्तक पुरुष और प्रकृति के प्रेम, बिछोह, वेदना, तड़प, टीस, और बहुत से रंगों से परिपूर्ण है।



रंजना जी एक अद्भुत रचनाकार और कलमकार हैं...जिनके भीतर का संगीत उनकी लेखनी से प्रवाहित होता रहता है कभी लघु कथाओं में, कभी उपन्यास के रूप में और अधिकतर उनकी कविताओं में। उनकी लेखन शैली बहुत ही सुंदर, सभी अलंकारों से युक्त, प्रकृति से तालमेल बढ़ते हुए आगे बढ़ती है जो पाठक के लिए आसानी से समझी जाने वाली और रोमांचक है...वो अपनी कृतियों में कठिन शब्दों का प्रयोग न करते हुए धारदार वाक्यों को गढ़ने में माहिर हैं। "एक प्याला कॉफी" उनकी नयी कविताओं की पुस्तक है जिसका मुखपृष्ठ बहुत सुंदर और आकर्षक है। पुस्तक में जो भी शब्दों की त्रुटियाँ हैं मेरी प्रार्थना है उनको अगले संस्करण में दूर किया जाना चाहिए...जिससे पाठन का आनंद दुगना हो जाएगा।

मैं रंजना प्रकाश जी के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ और आशा करता हूँ कि उनकी लेखनी हिन्दी साहित्य को इसी प्रकार सींचती हुए आगे बढ़ती रहे। 


राजीव पुंडीर

24 Nov 2020

Thursday, February 20, 2020

सिंदूर खेला : कहानी संग्रह - रंजना प्रकाश

परिचय:
श्रीमती रंजना प्रकाश की ये चौथी पुस्तक है। इससे पहले यादें (कविता संग्रह) अनावरण, प्रारब्ध और प्रेम ( उपन्यास ) प्रकाशित हो चुकी हैं जिनको पाठकों ने बहुत सराहा और पसंद किया। एविन्सपब पब्लिकेशन, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा इस पुस्तक को प्रकाशित किया गया है। मुझे उम्मीद है कि इस पुस्तक को भी पाठकों का भरपूर प्यार मिलेगा।
समीक्षा :
कहानियों का सृजन करना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन उससे भी कठिन है उन्हें पढ़कर उन पर अपनी प्रतिक्रिया देना। फिर भी लेखक कितना भी सिद्धहस्त हो, जैसे कि रंजना जी हैं, सबको इस बात को जानने की उत्सुकता रहती है कि उसके पाठकों की उसकी नयी रचना के प्रति क्या प्रतिक्रिया रही, क्या लोगों के मन को कहीं छू पायी, क्या जो बात लेखक पाठकों तक अपनी लेखनी के माध्यम से कहना चाहता है वो कह पाया या नहीं और कहीं कोई उसके लेखन में कमी तो नहीं रह गयी ताकि आगे सुधार कर सके। इस कहानी संग्रह में कुल 15 कहानियाँ है और पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूँ कि रंजना जी अपने उद्देश्य में सफल रही हैं ।
पहली कहानी 'वापसी' है जो नई पीढ़ी को एक स्पष्ट संदेश देती है कि वर्षों से चली आ रही परम्पराएँ भी तोड़ी जा सकती हैं यदि उनसे लाभ के बदले हानि हो रही हो। दूसरी कहानी 'दूसरी औरत' सब कुछ सह कर भी उन्हीं परम्पराओं को निभाने की शिक्षा देती है जो कि पहली कहानी के एकदम विपरीत है। लेकिन कहानी पढ़कर आपको दोनों कहानियों के सन्दर्भ में अंतर स्पष्ट हो जाता है कि अपनी जगह दोनों सही हैं। तीसरी कहानी 'माज़ी' है जो बताती है कि सच्चा प्रेम करने वाले ज़रूरी तो नहीं कि जीवन में शादी कर पाएँ। इस कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है जब पूर्व में रही प्रेमिका का सामना अपने प्रेमी और उसकी पत्नी से हो जाता है और उसका ये कहना कि आज से वो उसे अपनी ननद समझे, पाठक को हतप्रभ कर देता है। किसी चरित्र में अचानक ये बदलाव रंजना जी ही कर सकती हैं। जहां पाठकों को ये कुछ अटपटा लगेगा, वहीं अगर दूसरे कोण से देखें तो अपने और अपने प्रेमी के परिवार की खुशी के  लिए उस लड़की के द्वारा ये रूपान्तरण एक साहसिक कदम है। अब आगे बढ़ते हैं तो चौथी कहानी 'तूफान' से सामना होता है जो एक ऐसे तूफान से रूबरू कराती है जो कभी न कभी हम सबकी ज़िंदगी मे आता है और अगर हम चौकन्ने न हों तो ये हमारे घर को, हमारे रिश्तों को बर्बाद भी कर सकता है। पांचवी कहानी फिर से हमें हमेशा चौकन्ने रहने की सीख दे जाती है कि यदि कोई अचानक हम पर मेहरबान हो जाता है तो उसका बहुत बड़ा स्वार्थ है और वो हमारा ग़लत फायदा भी उठा सकता है।
"मेरे हृदय की धीमी-धीमी राख़ में दबी हुई आग जो विकराल रूप धारण कर चुकी है इससे किसी और को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। संभवतः मेरी अंतर ज्वाला ताउम्र आखिरी सांस तक मुझे तपाती रहेगी।" ये पंक्तियां छठी कहानी के अंत से ली गईं हैं जिसका नाम है 'अनावृत मन'। किस प्रकार से पहला प्रेम दुखदाई हो कर पूरे जीवन को सालता रहता है और वो टीस दिल ही दिल में हमेशा चुभती रहती है इसका वर्णन लेखिका ने बखूबी कर दिया है। अगली कहानी 'फॅमिली फ्रेंड' भी बढ़िया कहानी है जब पुराने प्रेमी जीवन को उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं जैसे वो आता है - बिना किसी विरोध के। 'प्रिटी लेडी' आठवें नंबर पर है। इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने एक स्त्री के मन की गहरी परतों को परत दर परत खोला है - कि किसी भी उम्र में उसके सोये हुए अरमानों को जगाया जा सकता है - बशर्ते कि जगाने वाला हुनरमंद हो । मुझे ये कहानी बहुत सुंदर लगी। कमोबेश अगली कहानी 'मसखरा' भी उसी तरह की कहानी है की जो हंसोड़ और मज़ाकिया लगता है उसके  व्यक्तित्व में भी एक गहराई होती है जिसे हम समझ नहीं पाते। दसवीं कहानी 'सिंदूर खेला' है जो इस कहानी संग्रह का टाइटिल भी है। दुखों से लड़ते लड़ते व्यक्ति किस प्रकार से एक साहसी व्यक्ति में परवर्तित होकर अत्यंत संवेदनशील हो जाता है और अंजाने लोगों की मदद करके उनको गहरे अवसाद से उबार कर जीवन जीने की कला सिखा देता है। इसी बहाव मे अगली कहानी 'प्रतुल स्टिल आई लव यू' है जिसका आधार भी वही मानवीय संवेदनाएं हैं जो अपने दुख से उपजती हैं और हमें अंजान लोगों की सहायता करने पर मजबूर कर देती हैं और जब हम उसमें सफल हो जाते हैं तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। एक माँ के वात्सल्य को समझना हो तो इस कहानी को पढ़ना होगा - 'और दीप जल उठे'। इसी कड़ी में अगली कहानी है 'अम्मा' जो हमारे समाज द्वारा प्रताड़ित एक स्त्री की दिल को छू लेने वाली कहानी है। एक भाभी अपने देवर को कितना प्यार दे सकती है वो भी एक माँ के रूप में, इसको अपने खूबसूरत शब्दों में लेखिका ने सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है 'खुशबू का रेगिस्तान' में। अंतिम कहानी 'प्रतिशोध' एक स्त्री के द्वारा लिए गए साहसिक निर्णय की गाथा है जो अद्भुत है।

रंजना प्रकाश की कहानियां, कविताएं और उपन्यास मानव मन की भावनाओं, प्रेम, कष्टों, और संवेदनाओं का सागर होते हैं जिसमें रह रह कर कभी प्रेम की, कभी दुख की, कभी किसी पात्र की ईर्ष्या, कभी क्रोध तो कभी हार्दिक सहानुभूति की लहरें उठती रहती हैं। इनका लेखन प्रेम और प्रकृति की धुरी के चारों ओर नृत्य करता प्रतीत होता है। लेखन में भारतीय संस्कृति, भाषा में एक सुंदर प्रवाह और शालीनता हमेशा बनी रहती है जो समाज को एक दिशा और संदेश देते हैं। इनको पढ़कर आने वाली नयी पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है। देखने में आ रहा है कि आजकल नई हिन्दी के नाम पर नए लेखक हर तरह की असभ्य भाषा को पाठकों के सामने परोस रहे हैं। ऐसे में रंजना जी की लेखनी में मुझे हिन्दी के साहित्य को सहेजने सवाँरने के लिए एक आशा कि किरण दिखाई देती है। मेरी सभी से प्रार्थना है कि ये अद्भुत कहानी संग्रह ज़रूर पढ़ें।

किताब का मुखपृष्ठ उसके शीर्षक से मेल नहीं खाता है। प्रथम दृष्ट्या लगता है कि ये कोई धार्मिक या फिर दर्शन शास्त्र की किताब है। लगता है कि प्रकाशक ने इस किताब को बिना पढ़े ही इसका कवर डिजाइन करवा दिया है। ऐसे में प्रकाशकों को चाहिए कि लेखक की सलाह ज़रूर लें। दूसरे, किताब में टाइपिंग करते समय कुछ शब्दों की अशुद्धियाँ रह गयी हैं, आशा है अगले संस्करण में इनको दूर कर दिया जाएगा। कहानियों में कुछ पत्रों के नाम बार-बार दोहराते हैं, जो पाठक के मन में उलझन जैसा कुछ पैदा करते हैं। हांलांकी लेखिका ने पहले ही इस तरफ इशारा तो किया है कि कुछ नाम उनको बेहद पसंद हैं लेकिन पाठक को एक कहानी से दूसरी कहानी पर जाते समय उलझन न हो, इस बात का ख्याल भी करना चाहिए।

कुल मिलाकर कहानियाँ बहुत सुंदर और किताब बहुत बढ़िया है। मैं रंजना जी के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ और इस समीक्षा को यहीं विराम देता हूँ।

राजीव पुंडीर
20/02/2020

Friday, November 22, 2019

The Eight Fbian Hearts : A Novel by Harsha Shastry

INTRODUCTION:

I received this book from my facebook friend Harsha Shastry who's written numerous short stories and screenplays for kids' shows like Chhota Bheem, Motu Patlu etc. That way I can say that he's an acclaimed writer. This novel "The Eight Fbian Hearts" is published by Tingle Books, Hapur, Meerut. On reading the book what I can say is that this is a book based on a unique concept - Imperfection - and if you want to know more about it you'll have to go through it and I assure you that it will not disappoint you.

THE STORY:

The story is woven around eight persons who use Facebook, a social media platform, to make new friends and to communicate with and a few search their love interest also knowing fully well that people from both sexes may be deceptive by hiding their true identities, original physical appearances, fake economic statuses and unrealistic positions in profession they claim to. This all revolves around the main theme of this novel that we the people are Imperfect and neither ready to accept those imperfections for ourselves nor of the others - like a few are obese where some are black in complexion, where some may have skin disease like leucoderma, the other may be bald, which lead them either to hide these things from others or create a fear of rejection in them, force them to lie ultimately leading them into depression. The writer has very beautifully put this problem, a social one, in a very interesting manner and tried to counsel them to face the realities of life, not to be deceptive ever in communicating with others; specially when they're seeking their life partner through social media platforms like Facebook etc.



REVIEW:

In this book the writer has taken a novel concept of imperfections occurring in human body and the fear of acceptance and rejection both create a kind of inferiority complex and feeling of insecurity in them. But when we come across the fact that almost each and every person has some kind of lacking, that feeling of negativity is overtaken by positivity and life looks beautiful. The language of the book is simple and the flow is smooth. Nowhere I found the plot as stretched and the story sumps up quickly on positive notes making the reader happy. The best point of the book is that it doesn't preach anything but says everything silently and indirectly.

MY TAKE:

In today's life when everything depends on social media, social status, social stigmas, and professional commitments and day to day stresses we go through, I strongly suggest the younger generation to go through this wonderful book. I would like to suggest the writer to edit the draft meticulously and remove certain typos and spelling mistakes before it goes for second edition. The cover of the book is fine.
My best wishes to Harsha Shastry for his next literary endeavour.

RATING: 

As Harsha has rightly dealt the subject of imperfection and justified it, the same I would like to say about this book as I cannot term it a perfect book which is natural and there's a scope of tremendous improvement. So being extremely careful and truthful my honest rating is 3/5.

Rajeev Pundir
22 Nov. 2019

Monday, March 25, 2019

साक्षात्कार श्रीमती रंजना प्रकाश



1॰ रंजना जी, मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है । कृपया पाठकों को अपना संक्षिप्त परिचय दीजिए । 


मैं केवल हाउस मेकर, गर्व से कह सकती हूं एक सुगृहणी हूं। मैने परिवार के सभी उत्तरदायित्व पूर्ण समर्पण और निष्ठा से निभाए। पहले काम काज करते हुए लिखती थी, पढ़ती थी
अब बस लिखती और पढ़ती हूं यही छोटा सा परिचय है मेरा ।

2॰ आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया ?

शायद  होश संभालते ही। पहले चोरीछुपे  तुकबन्दी, फिर जाने कब लेखन में तब्दील हो गया । कैसे का क्या जवाब दूं...चूंकि एक सिंगर होने के नाते, बालपन से गीत, ग़ज़ल से अटूट नाता हो गया तो गाते गाते गीतों की रचना करने लगी ।

3॰ आपकी अभिव्यक्ति का माध्यम कहानी है या कविता ? आप किसको प्राथमिकता देती है ?

निश्चित ही कविताएं मुझे ज्यादा रुचिकर लगती हैं। वैसे तो किसी भी विधा का लेखन अभिव्यक्ति का माध्यम ही है, परन्तु  मेरे लेखकीय जीवन में कविता का सर्वप्रथम आगमन हुआ, इसलिए कविता मेरी प्रिय विधा है।

4॰ अधिकतर देखने में आया है कि सभी लेखक, लेखिकाएं  अपनी रचनाओं में अपने ख़ुद के जीवन में घटित घटनाओं को ही आधार बनाकर कहानियां और कविताएं लिखते हैं। क्या आपकी रचनाएं भी आपके जीवन का प्रतिंबिंब  हैं? 

हूं ,,,,ये थोड़ा जटिल प्रश्न है ,,,,पर मैं ईमानदारी से जवाब दूंगी । ये सच है लेखक अपने बारे में लिखता है, मैं भी लिखती हूं ,,,पर ये अधूरा सच है । मैं केवल अपने बारे में नहीं लिखती । जहां तक गद्य का सवाल है उसमें मैं कम मेरे अपने ज्यादा हैं ,, हां  ,,कविताएं अधिकतर मेरी नितांत अपनी  गाथा कहती नज़र आएंगी ।यद्यपि उसमेँ भी समाज, आसपास की समस्याएं मिलेगी पर कहने में संकोच नहीं है कि मेरी कविताओं में मैं , वो और ईश्वर  विद्यमान है । आप मेरी कविताओं में स्पष्ट  छाप छायावाद की पाएंगे । मैं महादेवी वर्मा जी से  शुरू से ही प्रभावित रही हूं,,,,तो कुछ असर उनका तो है मेरे लेखन में ऐसा कई लोगों ने कहा है , हालाकि मैं उनकी चरण रज भी नहीं हूं ।

5॰ आजकल फेसबुक आदि मंचो पर बहुत अधिक लेखक और लेखिकाएं देखने को मिल रहे हैं । क्या ये मंच आपको पर्याप्त लगते हैं अपने आप को लेखक के रूप में स्थापित करने के लिए ?

हां ,,,,देख रही हूं, इन दिनों जैसे बाढ़ आ गई है लेखकों की । ठीक है सशक्त माध्यम है एक अच्छा प्लेटफार्म भी है फ़ेसबुक ,,,पर ये ही काफी नहीं है ,,ये प्रथम सोपान हो सकता है लेकिन ये मंजिल नहीं है। सफ़र इससे आगे और जटिल है । लेखन का आगाज़ ये हो सकता है अंजाम नहीं ,,, मेरा सभी से विनम्र निवेदन है कि इसे ही लक्ष्य न बनाएं :
ये रास्ता है हम है राही
मुकाम तो ये है नहीं
दूर तलक जाना है ,,,,





6॰ आप किस रूप में  अपनी किताब को देखना पसंद करेंगी सॉफ्ट कॉपी या हार्ड कॉपी  और क्यों ?

निश्चित ही पुस्तक  हार्ड कॉपी में ही भाती है मुझे । दुनिया कितनी भी आगे हो जाए, ये ई-बुक  नहीं पढ़ सकती मैं क्योंकि नई ताजा पुस्तक के प्रथम पृष्ठ को  स्पर्श करते ही जो सुखानुभूती होती है वो अकथनीय है । मुझे यूं लगता है जैसे किसी नवजात  शिशु की कोमल उंगलियों का प्रथम स्पर्श, नवल विकसित पुष्प का प्रथम दर्शन, जैसे किसी नन्ही नवेली उषा की उजली प्रथम किरण का स्पंदन ,,,क्या कहूं जवाब लंबा हो जाएगा ,, हां ये तय हो गया इस पर भी कविता लिखूंगी ,,अभी अभी विचार आने लगे है ,जल्द ही एक नई कविता की आहट सुन पा रही हूं ।सुंदर सवाल लाए हैं आप।
पिछले दिनों ही चार लाइन लिखी है  फ़ेसबुक में पोस्ट की थी ,,,
    काग़ज़ पे लिखना
    काग़ज़ को पढ़ना
    इससे बेहतर ,,,,
    कुछ  भी नहीं ,,
एक कतरा भी काग़ज़ का मै बरबाद नहीं कर सकती ,,,


7. आपके जीवन में पैसा अधिक महत्वपूर्ण है या प्रसिद्धि ?

ये सवाल आपने मुझसे पिछले  साक्षात्कार में भी पूछा था । मेरा जवाब आज भी वही है ।फिर दोहराती हूं, दोनों ही नहीं । मुझे लेखन से जो तुष्टि और राहत मिलती है वो  सुख मेरे लिए सर्वोपरि है । प्रसिद्धि ,पैसा जब आना होगा तो आयेगा इनके पाने से पूर्व को संतोष रूपी धन प्राप्त हो जाता है, मैं मालामाल हो जाती हूं । दूसरी  सम्पदा है मेरे लिए मेरे पाठकों की प्रतिक्रिया ,,ये अनमोल धन है अक्षय ।

8. एक लेखक के लिए क्या जरूरी है उसके अंदर का कलाकार , उसकी शैक्षणिक योग्यता  या फिर कुछ और ? 

निश्चित ही इन दोनों  की आवश्यकता तो होती है, पर इनके होते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते। यदि हम में लेखन के प्रति निष्ठा, लगन और पूर्ण समर्पण न हो । लिखने का जुनून बेहद ज़रूरी है । मैं स्टोर रूम, बॉक्स रूम, भीड़भाड़ में कहीं भी लिख लेती थी, टेबल कुर्सी मिले , न मिले ।आज भी सोते हुए भी कोई ख़्याल आता है तो आधी रात, तत्काल उठ कर लिखती हूं ,तभी नींद आती है । ये बिल्कुल सच है कि ये लगन ही हमें लेखक बनाती है । ऐसा  मेरा मानना है।

9. आपका आगे क्या लिखने का इरादा है  ?

क्या कहूं ,,,,लिखती ही रहती हूं कभी लेख ,, कभी कहानी या फिर गीत या ग़ज़ल । दो उपन्यास पूरे हो चुके हैं,,,दोनों  - अनावरण - और सिंदूरखेला  प्रकाशित हो चुके है. कविता संग्रह यादें है। आज कल बड़ी कठिन प्रक्रिया हो गई है । तीसरे उपन्यास पर अभी काम चल रहा है ।अब तो यही काम है मेरा सो लिखती रहती हूं ।
स + हित = साहित्य कहलाता है । कामना यही है जो हितकर हो वही लिखती रहूं ,जब तक  सामर्थ्य है,,,बाकी तो हर इच्छा भगवान की ।
॰10. नए उभरते कवियों और लेखकों के लिए आपका क्या सन्देश है  जिससे वो साहित्य में ठीक से अपना योगदान दे सकें ?

सामयिक सवाल है आपका ,,लेखकों ,,कवियों की भीड़ है इन दिनों । ये भी सच है कि बहुत लोग अच्छा भी लिख रहे है । परंतु  अधिकतर लोग शार्ट कट अपनाने का प्रयास करते हैं ,, लेखन ही क्या जीवन में ही शार्ट कट से बचना चाहिए ,,जल्दबाजी शतप्रतिशत  रिज़ल्ट नहीं दे सकती । श्रेष्ठता के लिए लंबी राह श्रेयस्कर है । खूब पढें , सुचिंतन , मनन  करें , सूक्षमाविलोकी बनें ,,ध्यान रहे नकल से परहेज़ करें ,,नैसर्गिकता में जो सौंदर्य है वो कहीं नहीं ।
अंत में मेरी ही दो  पंक्तियां  कहना चाहूंगी ।

तमाम लंबी उम्र का अफसाना
चन्द  लमहों  में बताऊं  कैसे ,,,,,

कोई भी साक्षात्कार  कभी  पूर्णता को नहीं प्राप्त हो सकता ।

धन्यवाद ,,,नमस्कार ,,,



***

Sunday, March 24, 2019

The Day Before I Died (Matroyshka) : By Ashi Kalim

Introduction :
Some stories, specially from our recent past aka modern history are so mysterious and intriguing that they compel us to find the truth and to go deep into them. This is a natural human nature. Perhaps, driven by the same, Ashi Kalim, the writer has tried to look into the life of a mysterious character of the daughter of Stalin named Svetlana through this novel. This book is published by Notion Press and available at Amazon.in

The Story:
Kunvar Brajesh Kumar Singh, a young man from India, fascinated by communism, goes to Russia to learn the tenets of communism under Stalin, the dictator of Russia. There he happens to meet his daughter Svetlana who Stalin calls his doll, also an active member of communist party. Attracted by his grand personality, Svetlana is attracted to him and eventually they fall for each other - perhaps in love, as both of them were not sure what they felt for each other in initial days.The story travels from Russia to India and finally concludes in USA in getting asylum for Svetlana. To know more about the fate of their love and all this maze like story, go through this interesting book.


Review:

Ashi Kalim, the author, took a challenge by choosing a story based on the love an Indian boy who is rather innocent in comparison of his love interest Svetlana; the daughter of a dictator known for his cruelty. In this endeavour the author did meticulous research, visited the related places, interviewed the people connected and gathered enough material and evidence. Keeping in view of the potential of the author, and the material she collected, this story could have been expanded more spreading it on at least 190 pages instead of only 90 pages. A novel is reduced to a novella. Perhaps, the author got so excited to publish a book on this subject that she penned it in haste as the story, in spite of running in a smooth flow, takes a tumultuous jumping route and ends up quickly missing many links, crossing gaps and overflowing at other places. The writer should work more on story and plot development of a novel of which she has an acumen but not applied.
The other compartment of improvement is its editing because if a reader finds a blunder in the very first line of any novel or a story, it puts a question mark on his/her ability to write. So without discounting the ability of writer, I sincerely advise the author, not only to re-edit it but to re-write the whole lot of manuscript filling all the gaps and joining all the missing links to make it a compelling read. Right now it is taken just as an extended story.

The writer Ash Kalim has a big potential of penning more books and I wish all the best for her future projects.

Ratings : 2.5/5

Rajeev Pundir
25/03/2019

Thursday, January 31, 2019

समीक्षा : अनावरण उपन्यास लेखिका रंजना प्रकाश

प्रस्तावना :

लेखिका रंजना प्रकाश से मैं जब से जुड़ा हूँ, उनकी लेखन शैली ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया है। फेसबुक पर अक्सर उनकी कविताओं का लोग बहुत आनंद  उठाते हैं जिनमें से एक मैं भी हूँ। उनके साथ "ज़िंदगी : कभी धूप, कभी छांव" कविता कहानी संग्रह में भी मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला और मैंने उनके लेखन और व्यक्तित्व की गहराई को जाना और समझा। इसके बाद उन्होंने मुझे अपने उपन्यास "अनावरण" के बारे में बताया और मुझसे आग्रह किया कि मैं उसका सम्पादन करूँ। पहले मुझे काफ़ी झिझक हुई, परंतु ये सोचकर कि इस बहाने उनसे कुछ सीखने को मिलेगा, मैं सहर्ष तैयार हो गया। अब उपन्यास आपके सामने है । पढ़िये और कहानी और भाषा का आनंद उठाईये। इस उपन्यास को आथर्स इंक इंडिया ने रोहतक से प्रकाशित किया है।

कहानी :
पूरा उपन्यास एक प्रेम कहानी है जो दो मुख्य पात्रों - तपन और शुभी के चारों और घूमती है। कहानी के दोनों पात्र अंतर्मुखी हैं जिसके कारण दोनों अपने भावों को एक दूसरे को व्यक्त करने में असमर्थ हैं। और यही असमर्थता उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन कर उनके आड़े आती रहती है। इसी की वजह से उनके जीवन में एक ऐसी उथल पुथल होती है कि दोनों ही मृत्यु के कगार तक पहुँच जाते हैं। बाद में यही कमजोरी उन दोनों की ताकत बनकर उनका हथियार बन जाती है और उनके जीवन को परिणीति तक पहुंचाती है।
कहानी बहुत सुंदर बन पड़ी है। पूरी कहानी को जानने के लिए पढ़ें - अनावरण


भाषा:
एक कवियित्री होने के कारण रंजना जी ने इस उपन्यास में भी उसी काव्यात्मक लय, ताल, और निर्मलता को बरकरार रखा है। उपन्यास की भाषा बहुत ही अलंकृत, सरल, तरल और मानव के ह्रदय में पनपने वाले भावों से युक्त है। एकदम स्वच्छ भाषा शैली में कही गयी ये कहानी पाठक के मन को मोह लेने में पूर्णतया सक्षम है। रंजना जी ने यथा योग्य अलंकारों और विशेषणों के प्रयोग से इस कहानी को, जो कभी कभी उदासी से भर देती है, एक खुशनुमा संजीदगी से भर दिया है। दूसरे कहानी का स्थान रुद्र प्रयाग है जहां ऊंचे हिमाच्छादित पर्वत हैं, इधर-उधर विचरते दूधिया सफ़ेद बादलों के टुकड़े हैं, शीतल हवा के झोंके हैं, सुंदर पक्षियों का कलरव है, घने वृक्षों की छाँव है, स्वामी जी का आश्रम है और कलकल बहती गंगा माँ है जो आपको हमेशा तरोताज़ा बनाए रखते हैं।


समीक्षा :
ये समीक्षा मैं एक सामान्य पाठक की प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ, न कि संपादक की नज़र से।
कहानी दो प्रेमियों की है जो खुलकर प्रेम का इज़हार नहीं कर पाते। पढ़ते पढ़ते लगता है कि कोई पुराने जमाने की फिल्म देख रहे हों। इस उपन्यास का इस समय आना लगता है कुछ देरी से हुआ क्योंकि ये ज़माना तुरत-फुरत प्रेम के इज़हार का है, परिणीति चाहे कुछ भी हो। इसलिए ये उपन्यास आज की नई पीढ़ी को कुछ अटपटा सा लग सकता है। वैसे आज भी पुराने ज़माने के पाठकों की कोई कमी नहीं है और मुझे लगता है कि ये उपन्यास सभी लोगों द्वारा स्वीकार किया जाएगा चाहे जिस भी उम्र के हों क्योंकि एक उपन्यास की सफलता सिर्फ उसकी उसकी कहानी ही नहीं परंतु एक उत्तम भाषा शैली और कहानी कहने के अंदाज़ पर भी निर्भर करता है जो यहाँ लाजवाब बन पड़ा है। दूसरे, मेरे विचार से इस कहानी को और विस्तार दिया जा सकता था जिसकी कमी पाठक को महसूस होती है। किसी भी कहानी में पाठक की रोचकता बनाए रखने के लिए उसमें कुछ अंतराल के बाद नई घटनाएँ और थोड़े चकित करने वाले मोड़ अपेक्षित होते हैं जिनकी इस उपन्यास में थोड़ी कमी है। लेकिन कहानी की अस्मिता को ध्यान में न रखते हुए उसमें ज़बरदस्ती ठेले गए वृतांत भी पूरे कथानक को कृत्रिमता की ओर धकेल देते हैं, जो कि रंजना जी ने बिलकुल नहीं होने दिया और कहानी को शुद्ध रूप में प्रस्तुत कर दिया है। इसके लिए मैं रंजना जी को साधुवाद देना चाहूँगा।

मैं रंजना प्रकाश को इस बेहतरीन उपन्यास के लिए ह्रदय से बधाई देता हूँ और उनसे इसी प्रकार लिखते रहने की आशा करता हूँ। उनके आगे आने वाले उपन्यासों की प्रतीक्षा रहेगी।
अनावरण को प्राप्त करने के लिए लिंक :
https://www.amazon.in/Anawaran-Ranjana-Prakash/dp/9385137875/ref=sr_1_fkmr0_1?ie=UTF8&qid=1548939636&sr=8-1-fkmr0&keywords=anavaran+by+ranjana+prakash

राजीव पुंडीर
30 Jan 2019

Tuesday, January 22, 2019

समीक्षा : नीली आंखें : लेखक राकेश शंकर भारती

मित्रों,
पिछले दिनों हिन्दी की कई किताबें पढ़ीं। बहुत निराशा हुई । तभी राकेश शंकर भारती से फेसबुक पर मुलाक़ात हुई और उन्होंने मुझे उनके द्वारा लिखी गयी किताब "नीली आँखें" पढ़ने का आग्रह किया। पहली नज़र में मुझे ये किताब भी वैसी ही लगी जिन्हें पढ़कर मैं ऊब चुका हूँ जिनमें नई हिन्दी के नाम पर सिर्फ गंदा सेक्स ( काम नहीं ) गंदी भाषा में  ही पाठकों को परोसा जा रहा है । इसलिए मैंने उनको मना कर दिया । लेकिन उन्होंने मुझे इसकी कहानियों की भूमिका बताई कि ये कहानियाँ यूक्रेन के समाज की कहानियाँ हैं क्योंकि वो वहीं पर रहते हैं। एक जिज्ञासु होने के कारण मुझे यूक्रेन के समाज में पनपने वाली कहानियों ने आकर्षित किया और मैं इस किताब को पढ़ने के लिए तैयार हो गया । मैंने ये किताब वर्ल्ड बुक फ़ेयर नई दिल्ली से ख़रीद ली। पढ़ने के बाद मेरी सोच  इस किताब के प्रति काफी बदल गयी। इस किताब को नवयुग प्रकाशन ने दिल्ली से प्रकाशित किया है।

इस किताब में कुल मिलाकर दस कहानियाँ हैं। इस किताब को पढ़ने के बाद दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं - पहली ये कि जिस व्यक्ति के अंदर लेखक विद्यमान होता है, जगह, देश, काल, भाषा, पहनावा, संस्कृति उसके लिए कोई मायने नहीं रखते और वो अपने लिए लिखने का मसाला खोज ही लेता है। उसके अंदर का लेखक बेचैन रहता है कुछ नया पाने के लिए, कुछ नया सूंघने के लिए, कुछ नया लिखने के लिए। राकेश शंकर भारती बधाई के पात्र हैं कि उनहोंने यूक्रेन के समाज कि विशेषताओं और विषमताओं दोनों को बखूबी समझा और कहानियाँ लिख डालीं। दूसरे, ये कि समाज कोई भी हो, धर्म कोई भी हो, देश कोई भी हो, भाषा कोई भी हो, आदमी और औरत की नैसर्गिक प्रकृति वही है, प्रवृत्ति वही है, एक दूसरे को पाने की, प्रेम करने की चाह वही है। न आदमी बदला है, न औरत।



इन कहानियों में प्रेम है, फ़रेब है, उनसे उपजे सुख और दुख हैं। ये कहानियाँ आपको पात्रों के प्रति संवेदना से भर देती हैं और कभी कभी इतना आश्चर्यचकित कर देती हैं कि आप भाव विभोर हो उठते हैं। कैसा लगा होगा जब एक लड़की को उसका बाप मिलता है जब वो अपनी आखिरी सांस ले रहा होता है, जिसने उसकी माँ को एक दूसरी औरत के लिए तभी छोड़ दिया था जब वो बिना शादी किए ही गर्भवती हो गयी थी। और कैसा लगा होगा एक पत्नी को जब वो और उस आदमी की प्रेमिका दोनों एक ही दिन एक ही हॉस्पिटल में प्रसव के लिए आती हैं, दोस्त भी बन जाती हैं और एक ही कमरे में एड्मिट हो जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी में एक औरत को उसका बहुत पुराना प्रेमी एक ट्रेन में मिल जाता है। और भी कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर आपको एक अलग समाज की नाड़ी किस प्रकार से चलती है उसका आभास हो जाएगा।

ये कहानियाँ हिन्दी में लिखी गयी हैं जिनमें उर्दू भाषा के शब्दों का काफ़ी प्रयोग हुआ है, और कहीं कहीं थोड़ा अश्लील भी हो गयी हैं मगर इनमें गंदा और भोंडापन नहीं है। जो भी है तर्कसंगत है। हाँ, राकेश जी को अपनी भाषा पर ध्यान देना होगा क्योंकि कहीं कहीं भाषा में कमी अखरती है क्योंकि विदेश में रहने के कारण शायद भाषा में उतनी परिपक्वता नहीं आई है जितनी मूलरूप से आवश्यक है,  और हर कहानी में अलग परिपेक्ष्य को अपनाना होगा ताकि कहानियों में नयापन झलक सके।

मैं राकेश शंकर भारती जी को इस कहानी संग्रह के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूँ। और इच्छा करता हूँ कि आप ऐसे ही लिखते रहें। सभी से अनुरोध है कि एकबार इस कहानी संग्रह को अवश्य पढ़ें।

राजीव पुंडीर
जनवरी 22, 20192 

Review : Tacit Stories By Jasmin Thaker

Long back a book hit the market titled Fifty Shades Of Grey. It became such a hit that I couldn't resist myself and jumped on to it to read. But to my astonishment, I found it absolute crap as it's neither a love story nor an erotica. And I could not go beyond a few pages.
Just by chance, I came to know about Jasmin and his penchant for writing. Tacit Stories is his first book and to my surprise it's an erotica. Erotica is very difficult genre and needs special talent, technical know-how and of course a command over the language used to write an erotica. I can say that Jasmin has all the above expertise and written these stories with perfection. I can say that no Indian author has penned such a wonderful book ever except Jasmin in this genre which is considered dirty, untouchable, inarticulable, and restricted in our society. Jasmin has taken a courageous step for writing this erotica book in true letter and spirit. After reading the book, people would wonder that an Indian writer can write such a book in such an amazing language which may titillate, excite and compel them to understand love and sex in pure form devoid of lust.

In the stories, there's love, passion, emotions, natural urge of having sex and getting physical pleasure in a tender and happy manner from both the partners.
The effect of the language, narration, sexual acts and the whole scenario is so profound that the reader is filled with love and sexual excitement in true sense.

I have found most erotica books dirty. But Jasmin has kept the language absolutely refined, neat and clean. And I would say that the book has a potential to surprise and mesmerise the reader.
I recommend the book to one and all, girls and boys, ladies and gentlemen, and even above sixty years of age to enjoy, to learn, to refresh and to rejuvenate their sex life.
I would suggest the author to divide this book into three parts as it seems to be too big comprising more than 300 hundred pages.
Congratulations Jasmin for writing such a wonderful book.
All the best for this book and for future!!

Rajeev Pundir
22/Jan/2019

Wednesday, January 9, 2019

एक शाम, एक ख़ास मुलाक़ात : लेखिका मंजु सिंह से।

साक्षात्कार :
पाठकों को अपना संक्षिप्त परिचय दीजिये I
मुझे लोग मंजु सिंह के नाम से जानते हैं । मैं अध्यापन के क्षेत्र से जुड़ी रही हूँ। मैने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद बी एड भी किया । लेखन मुझे आत्म संतुष्टि देता है। समाज में फैला किसी भी प्रकार का प्रदूषण मुझे जब विचलित करता है तब मैं अपनी भावनाओं को शब्द दे ही देती हूं अक्सर । लेख, कविता, कहानी, लघु नाटिका, समीक्षा, आलोचना, संस्मरण आदि लिखती रही हूं। मेरी रचनाएँ विभिन्न सोशल मीडिया के विभिन्न पोर्टलों पर प्रकाशित होती रही हैं। साहित्य कुँज , अनुभव पत्रिका, दा रायटर, प्रतिलिपि, मातृभाषा, हिंदी लेखक डॉट कॉम आदि पर रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। मोम्स्प्रेस्सो के लिए ब्लॉग भी लिखती रही हूँ। हाल ही में पहली बार मेरी रचनाएँ “जिंदगी :कभी धूप कभी छांव”  नामक साझा कविता-कहानी संग्रह में प्रकाशित हुई हैं। यही संक्षिप्त सा परिचय है मेरा।

2. आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया ?
लेखन यूँ तो विद्यार्थी जीवन में ही आरंभ हो गया था। उन दिनों भी दो चार कविताएं एक स्थानीय पत्रिका में प्रकाशित हुई थीं। मैं तब शायद नवीं कक्षा में थी। उसके बाद बस डायरी में लिखना जारी रहा। विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों और नौकरी के चलते समयाभाव रहा और लेखन लगभग बन्द ही हो गया। जब मैं 14 वर्ष की थी तब मेरी दो कविताएँ एक पत्रिका में छपी थीं जिसका अब नाम भी याद नहीं है। तब न जाने कितनी कविताएँ लिखीं लेकिन संग्रह नहीं किया । लिख तो तभी से रही हूँ लेकिन प्रकाशन के लिये कहीं भेजीं नहीं कभी।

3. आपकी अभिव्यक्ति का माध्यम कहानी है या कविता ? आप किसको प्राथमिकता देते हैं और क्यों ?
जब कलम के मन में जो भी आ जाए वही लिखती है वह । कहानी , कविता , लेख , संस्मरण , नाटिका , समीक्षा सभी कुछ लिखती हूं।


4. आपकी रचनाएं जीवन में किस चीज़ से या किन घटनाओं से प्रेरित होती हैं ?
अधिकतर देखने में आया है कि सभी लेखक-लेखिकाएं अपनी रचनाओं में अपने ख़ुद के जीवन में घटित घटनाओं को ही आधार बनाकर कहानियां और कवितायें लिखते हैं I क्या आपकी रचनाएँ भी आपके जीवन का प्रतिबिम्ब हैं ?
मेरी कविता आसपास के माहौल से अथवा घटनाओं के प्रभाव से ही प्रस्फुटित होती है । जब मन अधिक खिन्न या प्रसन्न होता है या यूँ कहें कि भावनाओं का अतिरेक ही कविता को जन्म देता है। जी लेखक भी समाज का अंग है और समाज में घटित घटनाएँ उसे प्रभावित करती ही हैं। कहानियाँ समाज से ही निकलती हैं अधिकतर । कभी व्यक्तिगत अनुभव पर भी आधारित होती हैं और कभी देखी सुनी घटनाओं से प्रेरित। कभी इतिहास की घटनाएँ भी कहानी या कविता का आधार बन जाती हैं।

5. आजकल फेसबुक आदि मंचों पर बहुत अधिक लेखक और लेखिकाएं देखने को मिल रहीं हैं I क्या ये मंच आपको पर्याप्त लगते हैं अपने आपको लेखक के रूप में स्थापित करने के लिए?
बात सही है कि आजकल सोशल मीडिया के रूप में एक सुलभ मंच सभी के लिये उपलब्ध है। मैं मानती हूं कि बहुत से लेखकों को ख्याति प्राप्त हुई है इसके माध्यम से जो कि पहले इतना सरल नहीं था। अब पुस्तक के रूप में अपनी रचनाओं के प्रकाशन के अवसर भी इसी मंच के माध्यम से बहुत सुलभ हो गए हैं। पहचान बनाने और स्वयं को लेखक के रूप में स्थापित करने के लिए आंशिक रूप से मददगार अवश्य है यह माध्यम।

6. आप किस रूप में अपनी किताब को देखना पसंद करेंगे – सॉफ्ट कॉपी में या हार्ड कॉपी में और क्यों?

मैं निश्चय ही हार्ड कॉपी के रूप में अधिक पसंद करूँगी क्योंकि उसकी उम्र और महत्व दोनों ही अधिक हैं।


7. आपके जीवन में पैसा अधिक महत्वपूर्ण है या प्रसिद्धि?
आज के समय में पैसे के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। यश की भूख भी बढ़ ही रही है लेकिन सच कहूँ तो मैं दोनों में से किसी के लिये नहीं लिखती केवल आत्मसन्तुष्टि ही मेरे लिए बड़ी चीज़ है। समाज में यदि एक व्यक्ति के विचारों में भी मेरे लेखन से कोई सकारात्मक परिवर्तन आ जाए तो लेखन सफल हो जाएगा ।

  8. एक लेखक के लिए क्या ज़रूरी है – उसके अन्दर का कलाकार, उसकी शैक्षिक योग्यताएं, या फिर  कुछ और ?
एक लेखक के लिए उसकी भावनाएँ और उसके विचार सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। उसके भीतर का कलाकार ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जिसके माध्यम से वह समाज को अपने विचार संप्रेषित करता है

9. आपका आगे क्या लिखने का इरादा है?
इरादा करके अभी तक तो कुछ लिखा नहीं कभी । हां परिस्थितियाँ जो भी लिखने की प्रेरणा देंगी, वह अवश्य लिखूंगी।  उपन्यास लिखने की इच्छा है। कोशिश ज़रूर करूंगी।

10. नए उभरते कवियों और लेखकों के लिए आपका क्या सन्देश है, जिससे वो साहित्य में ठीक से अपना योगदान दे सकें?
नए लेखकों से केवल यही कहना चाहूँगी कि कलम की शक्ति का महत्व समझें और वही लिखने का प्रयास करें जिससे समाज को एक दिशा मिल सके, एक सकारामक परिवर्तन की दिशा ।

                                                                             ****


Friday, November 23, 2018

Review : Four Stories Of Love Hope and Desire By Mahesh Sowani

Introduction:

This is a collection of four stories written by Mahesh Sowani. The format of the book is Kindle and it's available on Amazon.in for Rs. 49/- only. Stories have been selected from incidents happening around us in daily life and narrated in an interesting manner.

The Stories:

The very first story, Incomplete Lives, revolves around the life of a boy Kunal who's depressed because of his impending divorce with his wife. Despite it he's a bit upset with the hussle bussle of his official work also. His friend, Bhavna, who had been one year senior to him in college, now working abroad comes to meet him. What transpires between them and how she takes him out of that situation is the gist of the story and one must read such stories to know the importance of trivial things in our lives. Bhavna says to him, "We are not Gods, neither are all things in our control." Again she says,"Life is like a river....ever changing..." Beautiful!

The second story, Two Women, takes you to the lives of a labour class man Vishnu, his wife Meena and his paramour Lakshmi. The writer has very smoothly sailed through the intricacies of this triangular relationship. The story takes a sudden turn when Vishnu dies due to heavy drinking leaving the deed of a plot he bought for Lakshmi. Meena too stakes her claim over the plot. How the tussle between them is solved, just read the story. the climax is surprising - not easy to believe.

The third story, The Only Alternative, too is taken directly from lower class family. I found this story very different, very intense and baring the ugly games people play ignoring and even disrespecting the dignity of mutual relations that they can go to any extent to fulfill their sex drive. This shows the other side of the coin called society. A must read.

The last story entitled as Some Stories takes you to the lives of  retired persons who pass their time by forming a senior citizens club comprising men and women both. They communicate and share jokes with each other. Apart from it they want to make their club a different one. One of them Lily suggests about telling stories which everyone has deep in their hearts buried since years. And the drama begins...and a few interesting and intriguing stories tumble out from their personal diaries. A unique story indeed!


My Take :

In my view, Mahesh Sowani  has successfully carved out beautiful stories out of day-to-day life. The stories are inspiring, and the characters are having  love, hope, sympathy, mutual respect and concerned for each other. The language is simple, smooth like a fluid and easily graspable for one and all. The subject matter of the stories is also relatable for all age groups, genders and classes.
There're areas of improvement which demand attention. The first one is the manuscript needs re-editing as there're a few typos and grammatical errors. It can be done easily as this is Kindle edition and can be replaced instantly. The other is its title. Of course these four stories depict love, hope and desire, the book needs a compelling title.

I see a big potential in the writer and expect more books from his desk and congratulate him for penning these wonderful stories.

All the best!!

Rajeev Pundir
23/11/2018